Sunday, February 17, 2019

भारत सिंधु जल संधि को समाप्त क्यों नहीं कर सकता?

कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के काफिले पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' का दर्जा वापस लेने की घोषणा तो कर दी लेकिन कई हलकों में यह आवाज़ भी उठ रही है कि भारत को सिंधु जल समझौते को समाप्त कर देना चाहिए, हालांकि आधिकारिक तौर पर ऐसा अब तक कुछ नहीं कहा गया है.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल कहते हैं, "भारत को जितना सख़्त होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है. भारत को सिंधु जल संधि को तोड़ देना चाहिए, इससे पाकिस्तान सीधा हो जाएगा."

हालाँकि कई जानकारों को लगता है ये इतना सीधा नहीं है.

पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत जी पार्थसारथी कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर में भारत को हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पानी की आवश्यकता है लेकिन सिंधु जल संधि को तोड़ देना एक विवादित विषय है."

भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दूबे भी कहते हैं, "संधि को रद्द करके पाकिस्तान को मिले उसके अधिकार से वंचित करने से बहुत बड़ा मतभेद हो सकता है, बहुत बड़ी घटनाएं हो सकती हैं."

दरअसल पिछले कुछ सालों के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच जितनी बार विवाद बढ़ा है, उतनी बार सिंधु जल समझौते को तोड़ने की बात उठती रही है.

जब कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हमले के बाद भारत ने जल विवाद पर दिल्ली में होने वाली बैठक को रद्द कर दिया था.

तब पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार 'द न्यूज़' ने लिखा था कि जैसे जैसे जलवायु परिवर्तन की हकीक़त सामने आ रही है और जल संसाधनों की किल्लत बढ़ती जा रही है, भारत का 'पानी को हथियार के रूप में' इस्तेमाल करने की संभावना और बढ़ती जाएगी.

वहीं 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने लिखा था कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवादअन्य सभी विवादों पर भारी है.

कराची के उर्दू अख़बार 'डेली एक्सप्रेस' ने लिखा कि "समय की मांग है कि जल विवाद पर बातचीत जारी रहनी चाहिए और पाकिस्तान अपने हितों का बचाव करे."

ब्रिटिश राज के दौरान ही दक्षिण पंजाब में सिंधु नदी घाटी पर बड़े नहर का निर्माण करवाया था. उस इलाके को इसका इतना लाभ मिला कि बाद में वो दक्षिण एशिया का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र बन गया.

भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के दौरान जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसका पूर्वी भाग भारत के पास और पश्चिमी भाग पाकिस्तान के पास गया.

बंटवारे के दौरान ही सिंधु नदी घाटी और इसके विशाल नहरों को भी विभाजित किया गया. लेकिन इससे होकर मिलने वाले पानी के लिए पाकिस्तान पूरी तरह भारत पर निर्भर था.

पानी के बहाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व और पश्चिम पंजाब के चीफ़ इंजीनियरों के बीच 20 दिसंबर 1947 को एक समझौता हुआ.

इसके तहत भारत को बंटवारे से पहले तय किया गया पानी का निश्चित हिस्सा 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना तय हुआ.

1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात ख़राब हो गए.

भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था. बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया.

स्टडी के मुताबिक 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया. लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमरीका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी घाटी के बंटवारे पर एक लेख लिखा.

ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया. और फिर शुरू हुआ दोनो पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला.

ये बैठकें करीब एक दशक तक चलीं और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी घाटी समझौते पर हस्ताक्षर हुए.