प्रयागराज के कुंभ क्षेत्र में तीन दिवसीय परम धर्म संसद में संतों ने एलान किया है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण आगामी 21 फरवरी से शुरू हो जाएगा.
साधु-संत 10 फ़रवरी को बसंत पंचमी के बाद अयोध्या कूच करना शुरू कर देंगे और 21 फरवरी को मंदिर के शिलान्यास के लिए भूमि पूजन किया जाएगा. हालांकि ये किस जगह पर होगा, इस बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है.
तीन दिन तक चली परम धर्म संसद के आख़िरी दिन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने ये घोषणा की और बताया कि इसके लिए सभी अखाड़ों के संतों से भी बात हो चुकी है.
परम धर्म संसद का आयोजन कुंभ मेला क्षेत्र के सेक्टर नौ स्थित गंगा सेवा अभियानम के शिविर में हुआ था. तीन दिन के दौरान धर्म संसद में कई अन्य प्रस्ताव भी पारित किए गए.
आयोजकों की ओर से दावा किया गया है कि इस धर्म संसद में दुनिया भर से सनातन धर्म से जुड़े प्रतिनिधि आए थे और धर्म संसद के एजेंडे में राम मंदिर निर्माण की तारीख़ तय करना भी शामिल था.
परम धर्म संसद के आयोजक और गंगा सेवक अभियानम के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बीबीसी को बताया कि उन्हें सरकार से राम मंदिर निर्माण के संबंध में कोई उम्मीद नहीं है.
उनका कहना था, "जो सरकार काशी और प्रयाग में सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर नष्ट कर चुकी हो, उस सरकार से मंदिर निर्माण की उम्मीद करना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है. परम धर्म संसद में दुनिया भर से आए संतों और सनातन धर्म के प्रतिनिधियों ने ये तय कर लिया है कि 21 फरवरी को हर हाल में अयोध्या पहुंचना है. हमें यदि रोकने की कोशिश की जाएगी तो भी हम वहां पहुंचेंगे."
परम धर्म संसद के दौरान शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने गंगा के स्वच्छ न होने पर नाराज़गी जताई. उनका कहना था, "मां गंगा ने बुलाया है, मैं गंगा को निर्मल करूंगा जैसे नारे लगाकर सिर्फ हिंदुओं की सहानुभूति ली गई है. गंगा की दशा अभी भी दयनीय है. गंगा न तो निर्मल हुई हैं और न ही अविरल."
इस बीच, गुरुवार यानी 31 जनवरी से दो दिन की धर्म संसद कुंभ क्षेत्र में ही विश्व हिन्दू परिषद भी आयोजित कर रही है जिसमें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पहुंचने की भी उम्मीद जताई जा रही है.
वीएचपी की धर्म संसद में भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर किसी ख़ास घोषणा की उम्मीद की जा रही है.
प्रयागराज के कुंभ मेले में सोमवार को शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती की अध्यक्षता में परम धर्म संसद की शुरुआत हुई थी.
धर्म संसद में जहां केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ राम मंदिर को लेकर आलोचना प्रस्ताव पारित किया गया वहीं गंगा स्वच्छता समेत तमाम मुद्दों पर सरकार पर निशाना साधा गया.
Wednesday, January 30, 2019
Tuesday, January 22, 2019
India Vs NZ : न्यूज़ीलैंड के बारे में कितना जानते हैं आप?
भारत बनाम न्यूज़ीलैंड. क्रिकेट की दुनिया में जब-जब इस मुक़ाबले की बात आती है, तो तड़के होने वाले टेस्ट मैच और सबेरे की चाय के समय शुरू होने वाले वनडे मैच याद आते हैं.
लेकिन अगर आप क्रिकेट को हटा दें, तो न्यूज़ीलैंड के बारे में आप क्या जानते हैं? शायद बहुत कम. है ना? अगर ऐसा है तो भी झिझकने की बात नहीं है.
क्योंकि आप तो सिर्फ़ न्यूज़ीलैंड के बारे में कम ही जानते हैं, इतिहास की नज़र से देखें तो बहुत पुरानी बात नहीं, जब ये दुनिया न्यूज़ीलैंड के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी.
दरअसल, न्यूज़ीलैंड दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक संप्रभु देश है. इसके भूगोल की बात करें तो ज़मीन के दो बड़े टुकड़े हैं, जिन्हें नॉर्थ आइलैंड और साउथ आइलैंड कहा जाता है. और बीच में क़रीब 600 छोटे द्वीप हैं.
न्यूज़ीलैंड ऑस्ट्रेलिया से क़रीब 1500 किलोमीटर के फ़ासले पर है और दोनों देशों के बीच तस्मानिया सागर है. न्यू कैलेडोनिया, फ़िजी और टोंगा जैसे दूसरे द्वीपों से ये क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर है.
ये देश इतना दूर है कि इंसानी बसावट भी यहां काफ़ी देर बाद पहुंची. न्यूज़ीलैंड की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक यहां का इतिहास शानदार है, जिसमें माओरी और यूरोपीय संस्कृति का मिश्रण मिलता है.
लाहौर में क्यों लगी 'शैतान' की मूर्ति?
चीन में मंदी, भारत के लिए भी चिंता की बात?
न्यूज़ीलैड पहुंचने वाला सबसे पहला कबीला माओरी था. वो क़रीब एक हज़ार साल पहले हवाईकी से छोटी नौकाओं में सवार होकर यहां पहुंचे थे.
नीदरलैंड्स के रहने वाले एबल टैसमैन, इस देश को देखने वाले पहले यूरोपीय थे. हालांकि, वो ब्रिटेन था जिसने इस देश को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया. माओरी जब न्यूज़ीलैंड आए तो उसे औटेरो का नाम दिया, जिसका मतलब होता है 'लंबे सफ़ेद बादल वाली ज़मीन.'
माओरी के मुताबिक़ यहां पहुंचने वाले पहले शख़्स का नाम था क्यूप. वो सितारों और समंदर की लहरों को नेविगेशनल गाइड के तौर पर इस्तेमाल करते हुए अपने पोलीनेशियन घर हवाईकी से केनोइ पर सवार होकर यहां पहुंचे थे. ऐसा माना जाता है कि ये घटना क़रीब एक हज़ार साल पुरानी है.
एक दिलचस्प बात ये है कि अगर आप नक्शे पर हवाईकी खोजेंगे तो निराशा हाथ लगेगी लेकिन ऐसी मान्यता है कि माओरी साउथ पैसिफ़िक ओशियन के किसी द्वीप या द्वीप समूह से यहां आए थे.
क्यूप के बाद कई सैकड़ों साल तक दूसरे माओरी भी न्यूज़ीलैंड के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. ऐसा भी माना जाता है कि पोलीनेशिया से ये पलायन सुनियोजित था क्योंकि कई वाका हूरुआ यानी माओरी समाज के लोगों ने न्यूज़ीलैंड से हवाईकी का सफ़र भी किया.
माओरी समुदाय के लोग कुशल शिकारी और मछुआरे होते थे. उन्होंने ना केवल जानवरों, पंछियों और समंदर के जीवों का शिकार सीख लिया था बल्कि खेती करने में भी माहिर हो गए थे.
न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों के आने से पहले माओरी कबीलों के बीच युद्ध आम बात हुआ करती थी. माओरी योद्धा ताक़तवर और निडर हुआ करते थे और उन्होंने कई पारंपरिक हथियार तैयार करना सीख लिया था. आज भी इन्हें माओरी समारोहों में देखा जा सकता है.
माओरी के बाद अब बात न्यूज़ीलैंड के यूरोप से जुड़े तारों की. साल 1840 में वैतांगी संधि पर दस्तख़त हुए, जो ब्रिटिश क्राउन और माओरी के बीच हुए समझौते का आधार थी.
दुनिया में सबसे महंगा पेट्रोल, डीज़ल कहां बिक रहा है
दुनिया के सबसे क्यूट कुत्ते की 'दिल टूटने से' मौत
इस संधि ने न्यूज़ीलैंड में ब्रिटिश क़ानून की नींव रखी और इसे न्यूज़ीलैंड का आधारभूत दस्तावेज़ माना जाता है और इस देश के इतिहास का अहम हिस्सा भी.
उस वक़्त न्यूज़ीलैंड में क़रीब सवा लाख माओरी और दो हज़ार बाहरी लोग रहते थे, जो यूरोप से वहां जाकर बसे थे. पहले सील और व्हेल का शिकार करने वाले यूरोपीय यहां पहुंचे, फिर मिशनरी और उसके बाद कारोबारी.
जैसे-जैसे न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों की तादाद बढ़ने लगी, माओरी के बीच ये डर भी बढ़ने लगा कि ज़मीन को लेकर उनके साथ होने वाली सौदेबाज़ी में गड़बड़ की जा रही है. ये ख़ौफ़ भी बढ़ गया कि अगर इसे वक़्त रहते नहीं रोका गया तो फ़्रांस जैसा देश न्यूज़ीलैंड पर कब्ज़ा कर सकता है.
साथ ही वो ब्रिटिश लोगों की गैरकानूनी हरकतों को भी रोकना चाहते थे.
ब्रिटिश सेटलमेंट बढ़ने के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार ने माओरी कबीलों के प्रमुखों के साथ मिलकर औपचारिक दस्तावेज़ तैयार किया जिसके तहत न्यूज़ीलैंड को ब्रिटिश कॉलोनी बनाया गया.
लेकिन अगर आप क्रिकेट को हटा दें, तो न्यूज़ीलैंड के बारे में आप क्या जानते हैं? शायद बहुत कम. है ना? अगर ऐसा है तो भी झिझकने की बात नहीं है.
क्योंकि आप तो सिर्फ़ न्यूज़ीलैंड के बारे में कम ही जानते हैं, इतिहास की नज़र से देखें तो बहुत पुरानी बात नहीं, जब ये दुनिया न्यूज़ीलैंड के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी.
दरअसल, न्यूज़ीलैंड दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक संप्रभु देश है. इसके भूगोल की बात करें तो ज़मीन के दो बड़े टुकड़े हैं, जिन्हें नॉर्थ आइलैंड और साउथ आइलैंड कहा जाता है. और बीच में क़रीब 600 छोटे द्वीप हैं.
न्यूज़ीलैंड ऑस्ट्रेलिया से क़रीब 1500 किलोमीटर के फ़ासले पर है और दोनों देशों के बीच तस्मानिया सागर है. न्यू कैलेडोनिया, फ़िजी और टोंगा जैसे दूसरे द्वीपों से ये क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर है.
ये देश इतना दूर है कि इंसानी बसावट भी यहां काफ़ी देर बाद पहुंची. न्यूज़ीलैंड की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक यहां का इतिहास शानदार है, जिसमें माओरी और यूरोपीय संस्कृति का मिश्रण मिलता है.
लाहौर में क्यों लगी 'शैतान' की मूर्ति?
चीन में मंदी, भारत के लिए भी चिंता की बात?
न्यूज़ीलैड पहुंचने वाला सबसे पहला कबीला माओरी था. वो क़रीब एक हज़ार साल पहले हवाईकी से छोटी नौकाओं में सवार होकर यहां पहुंचे थे.
नीदरलैंड्स के रहने वाले एबल टैसमैन, इस देश को देखने वाले पहले यूरोपीय थे. हालांकि, वो ब्रिटेन था जिसने इस देश को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया. माओरी जब न्यूज़ीलैंड आए तो उसे औटेरो का नाम दिया, जिसका मतलब होता है 'लंबे सफ़ेद बादल वाली ज़मीन.'
माओरी के मुताबिक़ यहां पहुंचने वाले पहले शख़्स का नाम था क्यूप. वो सितारों और समंदर की लहरों को नेविगेशनल गाइड के तौर पर इस्तेमाल करते हुए अपने पोलीनेशियन घर हवाईकी से केनोइ पर सवार होकर यहां पहुंचे थे. ऐसा माना जाता है कि ये घटना क़रीब एक हज़ार साल पुरानी है.
एक दिलचस्प बात ये है कि अगर आप नक्शे पर हवाईकी खोजेंगे तो निराशा हाथ लगेगी लेकिन ऐसी मान्यता है कि माओरी साउथ पैसिफ़िक ओशियन के किसी द्वीप या द्वीप समूह से यहां आए थे.
क्यूप के बाद कई सैकड़ों साल तक दूसरे माओरी भी न्यूज़ीलैंड के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. ऐसा भी माना जाता है कि पोलीनेशिया से ये पलायन सुनियोजित था क्योंकि कई वाका हूरुआ यानी माओरी समाज के लोगों ने न्यूज़ीलैंड से हवाईकी का सफ़र भी किया.
माओरी समुदाय के लोग कुशल शिकारी और मछुआरे होते थे. उन्होंने ना केवल जानवरों, पंछियों और समंदर के जीवों का शिकार सीख लिया था बल्कि खेती करने में भी माहिर हो गए थे.
न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों के आने से पहले माओरी कबीलों के बीच युद्ध आम बात हुआ करती थी. माओरी योद्धा ताक़तवर और निडर हुआ करते थे और उन्होंने कई पारंपरिक हथियार तैयार करना सीख लिया था. आज भी इन्हें माओरी समारोहों में देखा जा सकता है.
माओरी के बाद अब बात न्यूज़ीलैंड के यूरोप से जुड़े तारों की. साल 1840 में वैतांगी संधि पर दस्तख़त हुए, जो ब्रिटिश क्राउन और माओरी के बीच हुए समझौते का आधार थी.
दुनिया में सबसे महंगा पेट्रोल, डीज़ल कहां बिक रहा है
दुनिया के सबसे क्यूट कुत्ते की 'दिल टूटने से' मौत
इस संधि ने न्यूज़ीलैंड में ब्रिटिश क़ानून की नींव रखी और इसे न्यूज़ीलैंड का आधारभूत दस्तावेज़ माना जाता है और इस देश के इतिहास का अहम हिस्सा भी.
उस वक़्त न्यूज़ीलैंड में क़रीब सवा लाख माओरी और दो हज़ार बाहरी लोग रहते थे, जो यूरोप से वहां जाकर बसे थे. पहले सील और व्हेल का शिकार करने वाले यूरोपीय यहां पहुंचे, फिर मिशनरी और उसके बाद कारोबारी.
जैसे-जैसे न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों की तादाद बढ़ने लगी, माओरी के बीच ये डर भी बढ़ने लगा कि ज़मीन को लेकर उनके साथ होने वाली सौदेबाज़ी में गड़बड़ की जा रही है. ये ख़ौफ़ भी बढ़ गया कि अगर इसे वक़्त रहते नहीं रोका गया तो फ़्रांस जैसा देश न्यूज़ीलैंड पर कब्ज़ा कर सकता है.
साथ ही वो ब्रिटिश लोगों की गैरकानूनी हरकतों को भी रोकना चाहते थे.
ब्रिटिश सेटलमेंट बढ़ने के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार ने माओरी कबीलों के प्रमुखों के साथ मिलकर औपचारिक दस्तावेज़ तैयार किया जिसके तहत न्यूज़ीलैंड को ब्रिटिश कॉलोनी बनाया गया.
Thursday, January 10, 2019
सीरिया से ईरान का प्रभाव ख़त्म करेगा अमरीका: पोम्पियो
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा है कि सीरिया से 'ईरान के हर रंगरुट को निकालने' के लिए उनका देश अपने सहयोगियों के साथ काम करेगा.
पोम्पियो ने ये भी कहा है कि जब तक ईरान और उसकी ओर से संघर्ष में जुटे लड़ाके बाहर नहीं जाते तब तक अमरीका सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के नियंत्रण वाले इलाक़े में पुनर्निर्माण के लिए कोई मदद नहीं देगा.
अमरीकी विदेश मंत्री ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का नाम लिए बिना उनकी मध्य पूर्व नीति की आलोचना की और कहा कि उनका 'आकलन पूरी तरह ग़लत' था.
ईरान ने पोम्पियो के बयान पर पलटवार किया है. अमरीकी विदेशी मंत्री पोम्पियो फिलहाल मिस्र के दौरे पर हैं और ये बातें उन्होंने काहिरा में कहीं.
अभी से करीब तीन हफ़्ते पहले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सीरिया से अमरीकी सैनिकों को हटाने के फ़ैसले का एलान किया था.
मध्य पूर्व में अहम अमरीका
पोम्पियो ट्रंप की ओर से किए गए एलान के बाद निराश हुए सहयोगी देशों को भरोसा देने में जुटे हैं.
उन्होंने कहा, "अमरीका आतंक के ख़िलाफ संघर्ष पूरा होने तक वापस नहीं जाएगा. हमारी और आपकी सुरक्षा के लिए ख़तरा बने आईसिस (इस्लामिक स्टेट समूह), अल क़ायदा और दूसरे जिहादियों को हराने के लिए हम आपके साथ मिलकर परिश्रम करेंगे."
उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में 'अमरीका की ताक़त अच्छी व्यवस्था कायम करने के लिए है. अमरीका जहां से निकलता है, अफ़रा तफरी की स्थिति बन जाती है.'
रान का ज़िक्र क्यों किया?
सीरिया में जारी संघर्ष में ईरान सीरिया की सरकार का समर्थन कर रहा है. रूस भी सीरिया का सहयोगी है. ईरान सीरिया की सरकार को हथियार, सैन्य सलाहकारों के अलावा कथित तौर पर सैनिक भी मुहैया कराता है.
अमरीका मध्य पूर्व में ईरान की गतिविधियों को लेकर आशंकित रहता है और उसे इस क्षेत्र को अस्थिर करने वाली ताक़त के तौर पर देखता है.
अमरीका के इस्राइल और सऊदी अरब के साथ दोस्ती के रिश्ते हैं जबकि ईरान के साथ इन दोनों ही देशों के रिश्ते अच्छे नहीं हैं.
पोम्पियो ने गुरुवार को कहा, " इस क्षेत्र और दुनिया में ईरान के बुरे प्रभाव और कार्रवाईयों को रोकने के लिए हम अपने अभियान को कमजोर नहीं होने देंगे."
उन्होंने कहा कि ईरान के ख़िलाफ अमरीकी प्रतिबंध कड़ाई से लागू रहेंगे.
ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ ने पोम्पियो के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमरीका जहां भी दखल देता है, 'वहां उथल पुथल, दमन और नाराज़गी का दौर शुरू हो जाता है.'
ओबामा की आलोचना क्यों की?
पोम्पियो ने सीधे तौर पर ओबामा का नाम नहीं लिया लेकिन उन्होंने ओबामा के उस भाषण का बार-बार ज़िक्र किया जो उन्होंने साल 2009 में काहिरा में दिया था. ओबामा ने इस भाषण में अमरीका और मध्य पूर्व के लिए नई शुरुआत की बात की थी.
पोम्पियो ने कहा, "इसी शहर में एक और अमरीकी व्यक्ति आपके सामने खड़े हुए थे. उन्होंने आपसे कहा था कि इस्लामी चरमपंथी विचारधारा से नहीं पनपते... उन्होंने आपसे कहा था कि अमरीका और मुस्लिम जगत को नई शुरुआत की जरुरत है. उन गलत आकलनों के काफी बुरे परिणाम हुए हैं."
उन्होंने कहा, " जब हमारे सहयोगियों की जरूरत थी तब हम डटकर खड़े होने का साहस नहीं दिखा सके."
ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ परमाणु समझौते के लिए ओबामा की आलोचना करता रहा है. ट्रंप प्रशासन ओबामा पर इस्लामी आतंकवाद के ख़िलाफ नरम रुख अपनाने और इसराइल के साथ अच्छे संबंध नहीं रखने के आरोप भी लगाता रहा है.
पोम्पियो ने ये भी कहा है कि जब तक ईरान और उसकी ओर से संघर्ष में जुटे लड़ाके बाहर नहीं जाते तब तक अमरीका सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के नियंत्रण वाले इलाक़े में पुनर्निर्माण के लिए कोई मदद नहीं देगा.
अमरीकी विदेश मंत्री ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का नाम लिए बिना उनकी मध्य पूर्व नीति की आलोचना की और कहा कि उनका 'आकलन पूरी तरह ग़लत' था.
ईरान ने पोम्पियो के बयान पर पलटवार किया है. अमरीकी विदेशी मंत्री पोम्पियो फिलहाल मिस्र के दौरे पर हैं और ये बातें उन्होंने काहिरा में कहीं.
अभी से करीब तीन हफ़्ते पहले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सीरिया से अमरीकी सैनिकों को हटाने के फ़ैसले का एलान किया था.
मध्य पूर्व में अहम अमरीका
पोम्पियो ट्रंप की ओर से किए गए एलान के बाद निराश हुए सहयोगी देशों को भरोसा देने में जुटे हैं.
उन्होंने कहा, "अमरीका आतंक के ख़िलाफ संघर्ष पूरा होने तक वापस नहीं जाएगा. हमारी और आपकी सुरक्षा के लिए ख़तरा बने आईसिस (इस्लामिक स्टेट समूह), अल क़ायदा और दूसरे जिहादियों को हराने के लिए हम आपके साथ मिलकर परिश्रम करेंगे."
उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में 'अमरीका की ताक़त अच्छी व्यवस्था कायम करने के लिए है. अमरीका जहां से निकलता है, अफ़रा तफरी की स्थिति बन जाती है.'
रान का ज़िक्र क्यों किया?
सीरिया में जारी संघर्ष में ईरान सीरिया की सरकार का समर्थन कर रहा है. रूस भी सीरिया का सहयोगी है. ईरान सीरिया की सरकार को हथियार, सैन्य सलाहकारों के अलावा कथित तौर पर सैनिक भी मुहैया कराता है.
अमरीका मध्य पूर्व में ईरान की गतिविधियों को लेकर आशंकित रहता है और उसे इस क्षेत्र को अस्थिर करने वाली ताक़त के तौर पर देखता है.
अमरीका के इस्राइल और सऊदी अरब के साथ दोस्ती के रिश्ते हैं जबकि ईरान के साथ इन दोनों ही देशों के रिश्ते अच्छे नहीं हैं.
पोम्पियो ने गुरुवार को कहा, " इस क्षेत्र और दुनिया में ईरान के बुरे प्रभाव और कार्रवाईयों को रोकने के लिए हम अपने अभियान को कमजोर नहीं होने देंगे."
उन्होंने कहा कि ईरान के ख़िलाफ अमरीकी प्रतिबंध कड़ाई से लागू रहेंगे.
ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ ने पोम्पियो के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमरीका जहां भी दखल देता है, 'वहां उथल पुथल, दमन और नाराज़गी का दौर शुरू हो जाता है.'
ओबामा की आलोचना क्यों की?
पोम्पियो ने सीधे तौर पर ओबामा का नाम नहीं लिया लेकिन उन्होंने ओबामा के उस भाषण का बार-बार ज़िक्र किया जो उन्होंने साल 2009 में काहिरा में दिया था. ओबामा ने इस भाषण में अमरीका और मध्य पूर्व के लिए नई शुरुआत की बात की थी.
पोम्पियो ने कहा, "इसी शहर में एक और अमरीकी व्यक्ति आपके सामने खड़े हुए थे. उन्होंने आपसे कहा था कि इस्लामी चरमपंथी विचारधारा से नहीं पनपते... उन्होंने आपसे कहा था कि अमरीका और मुस्लिम जगत को नई शुरुआत की जरुरत है. उन गलत आकलनों के काफी बुरे परिणाम हुए हैं."
उन्होंने कहा, " जब हमारे सहयोगियों की जरूरत थी तब हम डटकर खड़े होने का साहस नहीं दिखा सके."
ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ परमाणु समझौते के लिए ओबामा की आलोचना करता रहा है. ट्रंप प्रशासन ओबामा पर इस्लामी आतंकवाद के ख़िलाफ नरम रुख अपनाने और इसराइल के साथ अच्छे संबंध नहीं रखने के आरोप भी लगाता रहा है.
Friday, January 4, 2019
अरविंद केजरीवाल के कथित पोर्न वीडियो देखने की क्या है हक़ीक़त
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ट्विटर पर एक तथाकथित अश्लील वीडियो लाइक करने के लिए ट्रोल किया जा रहा है.
उन्हीं की पार्टी के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने गुरुवार सुबह ट्वीट किया, "दिल्ली के सीएम केजरीवाल जी ट्विटर पर पोर्न वीडियो देखते हुए पकड़े गए. कल रात ट्विटर पर पोर्न वीडियो लाइक कर रहे थे."
कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर तंज़ कसते हुए ये भी कहा कि 'लाना था पूर्ण स्वराज, लेकर बैठे पोर्न स्वराज'.
मिश्रा ने सबूत के तौर पर जो वीडियो शेयर किया है उसे 60 हज़ार से ज़्यादा बार देखा गया है और हज़ारों लोग इस वीडियो को शेयर कर चुके हैं.
कपिल मिश्रा के अलावा बीजेपी (दिल्ली) के प्रवक्ता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा, आईटी सेल के प्रमुख पुनीत अग्रवाल और अकाली दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी ऐसा ही एक वीडियो शेयर किया है. इन नेताओं के ज़रिए सैकड़ों लोगों के बीच ये वीडियो पहुँच चुका है.
इनमें से अधिकतर नेताओं ने दावा किया है कि अरविंद केजरीवाल पोर्न वीडियो देख रहे थे.
लेकिन अपनी पड़ताल में बीबीसी ने पाया कि वीडियो एक निर्वस्त्र आदमी का ज़रूर है, पर इसके 'पोर्न वीडियो' होने का दावा ग़लत है.
ये सच है कि बुधवार रात को अरविंद केजरीवाल ने उस वीडियो को लाइक किया था जिसे ट्रोल करने वाले एक पोर्न वीडियो बता रहे हैं.
ये वीडियो ऑस्ट्रेलियाई मूल की लेखिका और यूके में पेशे से वकील, हेलेन डेल ने ट्वीट किया था.
बुधवार सुबह ट्वीट किये गए इस वीडियो को अब तक 70 लाख से ज़्यादा बार देखा जा चुका है और क़रीब 32 हज़ार लोगों ने इस वीडियो को लाइक किया है.
हेलेन डेल ने ट्विटर पर इस वीडियो के साथ लिखा था कि ये वीडियो इंटरनेट पर बहुत ज़्यादा पसंद किया जा रहा है.
ये वीडियो जापान के एक कॉमेडियन कोजुहाए जुएकूसा का है जिन्हें खाने की टेबल पर इस्तेमाल होने वाले कपड़े के साथ 'ख़तरनाक' स्टंट करने के लिए भी जाना जाता है.
जुएकूसा बीते 10 सालों से स्टेज कॉमेडी करते हैं. वो कई लोकप्रिय जापानी टीवी शोज़ में भी हिस्सा ले चुके हैं. अपने इन्हीं करतबों के लिए उन्हें रियलिटी शो 'Britain's Got Talent' में भी सेमीफ़ाइनल तक पहुँचने का मौक़ा मिला.
यू-ट्यूब पर उनके क़रीब पाँच हज़ार सब्सक्राइबर हैं. ट्विटर पर उन्हें क़रीब 34 हज़ार लोग, वहीं इंस्टग्राम पर क़रीब सवा लाख लोग फ़ॉलो करते हैं.
पोर्न की श्रेणी से बाहर
यू-ट्यूब, ट्विटर और इंस्टग्राम ने अपने अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुसार कॉमेडियन कोजुहाए जुएकूसा के वीडियोज़ को एक किस्म की कला मानते हुए पोर्न की श्रेणी से बाहर रखा है.
उदाहरण के लिए, यू-ट्यूब की 'Nudity and sexual content policy' के अनुसार उनके प्लेटफ़ॉर्म पर पोर्नोग्राफ़ी वर्जित है और पोर्न वीडियो को तुरंत हटा दिया जाता है. लेकिन अगर निर्वस्त्र होकर कोई एजुकेशनल, डॉक्यूमेंट्री, साइंस या आर्ट के उद्देश्य से वीडियो पोस्ट करता है तो उसे स्वीकार किया जाता है.
सोशल मीडिया पर कई लोग कॉमेडियन कोजुहाए जुएकूसा के बिना कपड़ों के किए गए इन स्टंट्स को अश्लील मानकर इनकी आलोचना करते हैं.
उन्हीं की पार्टी के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने गुरुवार सुबह ट्वीट किया, "दिल्ली के सीएम केजरीवाल जी ट्विटर पर पोर्न वीडियो देखते हुए पकड़े गए. कल रात ट्विटर पर पोर्न वीडियो लाइक कर रहे थे."
कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर तंज़ कसते हुए ये भी कहा कि 'लाना था पूर्ण स्वराज, लेकर बैठे पोर्न स्वराज'.
मिश्रा ने सबूत के तौर पर जो वीडियो शेयर किया है उसे 60 हज़ार से ज़्यादा बार देखा गया है और हज़ारों लोग इस वीडियो को शेयर कर चुके हैं.
कपिल मिश्रा के अलावा बीजेपी (दिल्ली) के प्रवक्ता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा, आईटी सेल के प्रमुख पुनीत अग्रवाल और अकाली दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी ऐसा ही एक वीडियो शेयर किया है. इन नेताओं के ज़रिए सैकड़ों लोगों के बीच ये वीडियो पहुँच चुका है.
इनमें से अधिकतर नेताओं ने दावा किया है कि अरविंद केजरीवाल पोर्न वीडियो देख रहे थे.
लेकिन अपनी पड़ताल में बीबीसी ने पाया कि वीडियो एक निर्वस्त्र आदमी का ज़रूर है, पर इसके 'पोर्न वीडियो' होने का दावा ग़लत है.
ये सच है कि बुधवार रात को अरविंद केजरीवाल ने उस वीडियो को लाइक किया था जिसे ट्रोल करने वाले एक पोर्न वीडियो बता रहे हैं.
ये वीडियो ऑस्ट्रेलियाई मूल की लेखिका और यूके में पेशे से वकील, हेलेन डेल ने ट्वीट किया था.
बुधवार सुबह ट्वीट किये गए इस वीडियो को अब तक 70 लाख से ज़्यादा बार देखा जा चुका है और क़रीब 32 हज़ार लोगों ने इस वीडियो को लाइक किया है.
हेलेन डेल ने ट्विटर पर इस वीडियो के साथ लिखा था कि ये वीडियो इंटरनेट पर बहुत ज़्यादा पसंद किया जा रहा है.
ये वीडियो जापान के एक कॉमेडियन कोजुहाए जुएकूसा का है जिन्हें खाने की टेबल पर इस्तेमाल होने वाले कपड़े के साथ 'ख़तरनाक' स्टंट करने के लिए भी जाना जाता है.
जुएकूसा बीते 10 सालों से स्टेज कॉमेडी करते हैं. वो कई लोकप्रिय जापानी टीवी शोज़ में भी हिस्सा ले चुके हैं. अपने इन्हीं करतबों के लिए उन्हें रियलिटी शो 'Britain's Got Talent' में भी सेमीफ़ाइनल तक पहुँचने का मौक़ा मिला.
यू-ट्यूब पर उनके क़रीब पाँच हज़ार सब्सक्राइबर हैं. ट्विटर पर उन्हें क़रीब 34 हज़ार लोग, वहीं इंस्टग्राम पर क़रीब सवा लाख लोग फ़ॉलो करते हैं.
पोर्न की श्रेणी से बाहर
यू-ट्यूब, ट्विटर और इंस्टग्राम ने अपने अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुसार कॉमेडियन कोजुहाए जुएकूसा के वीडियोज़ को एक किस्म की कला मानते हुए पोर्न की श्रेणी से बाहर रखा है.
उदाहरण के लिए, यू-ट्यूब की 'Nudity and sexual content policy' के अनुसार उनके प्लेटफ़ॉर्म पर पोर्नोग्राफ़ी वर्जित है और पोर्न वीडियो को तुरंत हटा दिया जाता है. लेकिन अगर निर्वस्त्र होकर कोई एजुकेशनल, डॉक्यूमेंट्री, साइंस या आर्ट के उद्देश्य से वीडियो पोस्ट करता है तो उसे स्वीकार किया जाता है.
सोशल मीडिया पर कई लोग कॉमेडियन कोजुहाए जुएकूसा के बिना कपड़ों के किए गए इन स्टंट्स को अश्लील मानकर इनकी आलोचना करते हैं.
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