Thursday, March 28, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: वरुण और मेनका गांधी ने आपस में क्यों बदली सीटें? - नज़रिया

2019 चुनाव के लिए वरुण गांधी और उनकी मां मेनका गांधी ने अपनी सीटें क्यों बदलीं, इसे लेकर चर्चाएं ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. माना यह जा रहा है कि वरुण को सुल्तानपुर से अपना राजनीतिक गढ़ पीलीभीत शिफ़्ट करने के पीछे मां की अपने बेटे को 'सुरक्षित' सीट देने की भावना हो सकती है.

दोनों ने ही अपने चुनाव क्षेत्रों की अच्छी देखभाल की है और दोनों ही अपने क्षेत्रों से काफ़ी जुड़े हुए हैं.

मेनका ने पीलीभीत से छह चुनाव और पड़ोस की आंवला सीट से एक चुनाव जीता. फिर जब उन्होंने सुल्तानपुर से लड़ने का तय किया तो यह भी उन्होंने बेटे वरुण के फ़ायदे के लिए ही किया.

2009 के चुनावों में यह साफ़ हो गया था कि जोखिम मां ने उठाया. ज़ाहिर है, वह नहीं चाहती होंगी उनका बेटा यह जोखिम उठाए.

सांसद के तौर पर सात बार चुनी गईं मेनका के लिए यह पहला मौक़ा था जब वह 8000 से भी कम वोटों से जीतीं. पीलीभीत से उन्होंने जितने भी चुनाव लड़े, जीत का मार्जन सवा लाख से ढाई वोटों के बीच रहा था.

वहीं, बेटे वरुण ने पीलीभीत से पहला चुनाव लड़ते हुए 4 लाख 19 हज़ार 539 वोटों से जीत हासिल की.

उनके क़रीबी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी वी.एम. सिंह थे जो उनकी मां के चेचेरे भाई हैं. उन्हें सिर्फ़ 1 लाख़ 38 हज़ार 38 वोट मिले.

2014 तक वरुण ने ख़ुद को बीजेपी के फ़ायरब्रैंड लीडर के तौर पर स्थापित करने में क़ामयाबी हासिल कर ली थी जो कि कड़ी चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार थे. ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने सुल्तापुर से लड़ने की इच्छा भी जताई थी.

सुल्तानपुर एक समय उनके पिता संजय गांधी की राजनीतिक नर्सरी रही थी. उन्होंने अमेठी से पहला चुनाव लड़ा था जो उस समय सुल्तानपुर ज़िले का हिस्सा था.

मज़ेदार बात यह है कि वरुण के चचेरे भाई बहन राहुल और प्रियंका ने कभी उन्हें परेशान नहीं किया. भले ही वे बगल की अमेठी और रायबरेली सीटों पर प्रचार करते रहे. वरुण ने भी ख़ुद को दूर ही रखा और कभी अपने भाई-बहनों का रास्ता नहीं काटा.

वह सुल्तानपुर से जीते और अपने क़रीबी प्रतिद्वंद्वी बीएसपी के पवन पांडे को 1 लाख 80 हज़ार वोटों के अंतर से हराया. हालांकि इस बार कांग्रेस के मज़बूत प्रत्याशी संजय सिंह हैं जो न सिर्फ़ 2009 में यहां से जीते थे बल्कि अमेठी के पूर्व राज परिवार से भी आते हैं.

2014 में तो फिर भी मोदी लहर थी. ऐसे में इस बार इन सब बातों ने सुल्तानपुर से फिर से लड़ने का वरुण का विचार बदला होगा.

ऐसे में राजनीतिक समझ यही बनती है कि मां ने बेटे का ख्याल रखते हुए उसके हित में इस बार सीट बदल ली. मेनका चाहती हैं कि बेटा पीलीभीत में उनकी विरासत संभाले, जिसकी वह 1989 से लेकर बच्चे की तरह देखभाल करती आई हैं, जबसे उन्होंने पहला चुनाव जीता था.

पहले एक बार यहां से सांसद रह चुके वरुण भी इस इलाके़ को अच्छी तरह से समझते हैं. अहम बात यह है कि मां को पूरा विश्वास है कि पीलीभीत से जीतना बेटे के लिए आसान रहेगा. और सुल्तानपुर में संभावित चुनौतियों से जूझने के लिए ख़ुद वह सुल्तानपुर शिफ्ट हो गईं.

मेनका गांधी के समर्थकों के मुताबिक़ उनके अंदर कांग्रेस के प्रत्याशी संजय सिंह से लड़ने की हिम्मत है. संजय सिंह शुरुआती दिनों में मेनका के पति संजय गांधी के क़रीबी थे.

बहुत से लोगों को हैरानी इस बात की है कि वरुण अपनी सीट बदलने के लिए तैयार कैसे हो गए? उनके पार्टी के नेतृत्व से रिश्ते कैसे हैं, यह बात छिपी नहीं है. और इसकी वजह भी यह मानी जाती है कि उन्हें मन में जो आए, वह कहने की आदत है और वह किसी का आदेश नहीं सुनते.

उनके क़रीबी सहयोगी, जिन्होंने पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर बताया, "वरुण गांधी जिसके हक़दार हैं, वह उन्हें कभी बीजेपी से नहीं मिला. इसलिए क्योंकि वह 'गांधी' हैं. सोचिए, योग्य वरुण गांधी के नाम पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए विचार नहीं किया गया और यह पद भगवाधारी योगी आदित्यनाथ को चला गया."

इसकी संभावनाएं कम ही हैं कि पार्टी के नेतृत्व ने उन्हें पीलीभीत जाने के लिए कहा होगा. पीलीभीत में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने को लेकर उन्हें काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था. हालांकि बाद में कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया था. मगर इसके बाद वरुण ने सुल्तानपुर में अच्छे काम करके वाहवाही भी बटोरी है.

उन्होंने सुल्तानपुर में ग़रीबों के लिए अपने निजी पैसों से 300 घर बनाए हैं और 700 घर क्राउड फ़ंडिंग के माध्यम से बनाए हैं. वह ख़ुद मानते हैं कि यह अनोखा काम था.

Friday, March 22, 2019

ब्रिटेन के बर्मिंघम में पांच मस्जिदों को बनाया गया निशाना

शुरुआती रिपोर्ट्स के अनुसार ये हमले बुधवार देर रात से गुरुवार सुबह होने के बीच में किये गए. पुलिस के मुताबिक़, मस्जिद की बाहरी खिड़कियों पर एक मज़बूत हथौड़े से हमला किया गया. बर्चफ़ील्ड रोड पर स्थित मस्जिद पर यह हमला देर रात क़रीब ढाई बजे किया गया.

देर रात जैसे ही इस हमले की सूचना मिली उसके ठीक 45 मिनट बाद एक ऐसे ही हमले की सूचना अर्डिंगटन में भी मिली. इसके अलावा एस्टन और पेरी बार में भी ठीक ऐसे ही हमले की सूचना पुलिस अधिकारियों को मिली. इसके अलावा अलबर्ट रोड पर भी ऐसा ही हमला हुआ.

गृह सचिव ने इस हमले को गंभीर और चिंता में डालने वाला बताया है.

वेस्ट मिडलैंड्स की पुलिस ने कहा कि अभी तक इन हमलों का असल मक़सद पता नहीं चल सका है लेकिन अधिकारी इसके पीछे का कारण जानने का प्रयास कर रहे हैं.

एस्टन में मस्जिद फ़ैज़ुल इस्लाम मस्जिद के चेयरमेन यूसुफ़ ज़मान का कहना है कि जब मुझे इस हमले के बारे में पता चला तो मुझे पहली बार में यक़ीन ही नहीं हुआ. आख़िर इसके पीछे वजह क्या हो सकती है.

वो कहते हैं कि इस हमले की वजह से लोगों में डर समा गया है. वो अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और इसलिए वो उन्हें मस्जिद भेजने में भी डर रहे हैं.

हालांकि ज़मान ज़ोर देते हुए कहते हैं कि ऐसा कोई भी हमला उन्हें प्रार्थना करने से रोक नहीं सकता.

वो कहते हैं, "हम अपनी प्रार्थना रोज़ाना की तरह करते रहेंगे और हम किसी भी क़ीमत पर हिंसा को बढ़ावा देने वालों को जीतने नहीं देंगे."

उन्होंने कहा कि मस्जिदों के आसपास सुरक्षा पर चर्चा के लिए एक शिखर सम्मेलन भी किया गया था.

विटन इस्लामिक सेंटर के प्रवक्ता का कहना है कि देर रात क़रीब डेढ़ बजे एक आदमी सीसीटीवी में क़ैद हुआ है. यह शख़्स मस्जिद पर हमले करता हुआ दिख रहा है.

इन हमलों के संदर्भ में सांसद जॉन कॉटन ने ट्वीट किया कि हमला करने वाले किसी भी क़ीमत पर बर्मिंघम को बांट नहीं सकते.

हालांकि ये हमले क्यों किये गए, इनका मक़सद अभी भी स्पष्ट नहीं हो सका है. बर्मिंघम लेडीवुड के सांसद ने इन हमलों की सख़्त शब्दों में निंदा की है.

Thursday, March 14, 2019

समझौता ट्रेन धमाके का फ़ैसला ऐन वक़्त पर टलवाने वाली राहिला कौन

हिंदुत्ववादी विचारधारा रखने वाले असीमानंद सहित सुनील जोशी, रामचंद्र कालसांगरा, संदीप डांगे और लोकेश शर्मा का नाम आरोप पत्र में शामिल है.

तभी ख़बर आई कि फ़ैसले को 14 मार्च के लिए टाल दिया गया है.

कारण था कि एक पाकिस्तानी महिला राहिला वकील ने एक भारतीय वकील मोमिन मलिक के माध्यम से अदालत में दिए आवेदन में कहा कि मामले से जुड़े पाकिस्तानी चश्मदीदों को बुलाया जाए और वो भी अपनी बात अदालत के सामने रखना चाहते हैं.

जांच एजेंसी एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी से कहा कि इससे पहले अदालत के कई समन जारी करने के बावजूद पाकिस्तान की तरफ़ से से कोई जवाब नहीं आया था.

उधर राहिला का दावा है कि उन्हें आज तक कोई समन नहीं मिला.

फ़ैसले के ऐन वक्त पर आवेदन दाख़िल करने वाली राहिला वकील आखिर कौन हैं?

समझौता ब्लास्ट से संबंध
18 फ़रवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत में हुए एक धमाके और उसके बाद लगी आग में 68 लोग मारे गए थे. मरने वालों में ज़्यादातर पाकिस्तानी थे.

मैं धमाके के कुछ घंटे बाद ही घटनास्थल पर पहुंचा था.

धमाके और आग से रेल के डिब्बे अंदर और बाहर से पूरी तरह जल गए थे.

कुछ दूर पर ही एक कमरे में मृतकों के कुछ शवों को इकट्ठा करके रखा गया था.

भारत सरकार के मुताबिक़ मरने वालों में मोहम्मद वकील भी शामिल थे. राहिला मोहम्मद वकील के बेटी हैं.

पाकिस्तान के हफ़ीज़ाबाद ज़िले के ढींगरावाली गांव की रहने वाली राहिला मानने को तैयार नहीं हैं कि ट्रेन हादसे में उनके पिता मोहम्मद वकील की मौत हो गई थी.

राहिला का मानना है कि उनके पिता किसी भारतीय जेल में बंद हैं.

लंबे वक्त से भारत में राहिला के वकील पानीपत के मोमिन मलिक के मुताबिक उन्होंने करीब 90 भारतीय जेलों में आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी लेकिन कहीं भी मोहम्मद वकील नहीं मिले.

आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी राहिला 18 जनवरी को अपने घर पर ही थीं जब उन्हें टीवी पर ट्रेन बम धमाके का पता चला.

मोहम्मद वकील 11 जनवरी को एक महीने के लिए भारत के मुजफ्फ़रनगर में अपने परिवार से मिलने पहुंचे थे लेकिन पाकिस्तान में बेटे के एक्सीडेंट के बाद वो जल्दी ही वापस पाकिस्तान की ओर रवाना हो गए.

लेकिन वो आज तक घर नहीं पहुंचे.

राहिला की मां का परिवार उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर का रहने वाला है.

राहिला के वकील मोमिन मलिक ने अमृतसर में हमारे सहयोगी रविंदर सिंह रॉबिन को बताया कि अधिकारियों को कई चिट्ठियां लिखने के बाद ही साल 2010 में एनआईए ने उनसे मोहम्मद वकील की मौत की पुष्टि की.

बीबीसी से बातचीत में राहिला ने अपने दावे के चार मुख्य आधारों को गिनाया.

धमाके के एक दिन पहले की रात को याद करते हुए राहिला बताती हैं, "मामू ने अब्बू से बात करवाई थी... अब्बू ने कहा था कि हम ट्रेन में बैठ गए हैं. ट्रेन चलने वाली है. आपके मामू दिल्ली में ट्रेन में बैठाने आए हुए हैं. आप लोग परेशान न हों."

धमाके के थोड़े वक्त बाद ही राहिला अपने अंकल के साथ 10 दिनों के इमरजेंसी वीज़ा पर पानीपत पहुंचीं.

वो बताती हैं, "रेलवे वालों ने सामान चेक करवाया. मैंने एक-एक शव को देखा और चेक किया", लेकिन उन्हें अपने पिता से जुड़ा कोई सामान नहीं मिला.

राहिला के मुताबिक पानीपत में उनका डीएनए टेस्ट हुआ जिसके नतीजे किसी भी शव के डीएनए से मैच नहीं हुए.

उनका दावा है कि 2008-9 में उनके पास भारत सरकार की ओर एक चिट्ठी आई जिसमें कहा गया कि उनका बेटा या भाई दोबारा डीएनए टेस्ट के लिए भारत आए.

वो कहती हैं, "मेरे छोटे भाई और चाचा भारत गए. उनका भी डीएनए टेस्ट किसी शव से मैच नहीं हुआ."

एनआईए वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया राहिला ने तो "रेलवे ट्राइब्यूनल से क्लेम भी ले लिया है... नो नो नो. उनका कहना है कि चश्मदीद एक दो ज़िंदा हैं... उन्होंने कोई नाम भी नहीं दिए हैं."

उधर राहिला का परिवार कोई मुआवज़ा मिलने से इनकार करती हैं.

उनके वकील मोमिन मलिक ने अमृतसर में हमारे साथी रविंदर सिंह रॉबिन को बताया कि साल 2010 में उन्होंने मुआवज़े की रक़म के लिए अदालत में एक अर्ज़ी दाखिल की थी.

सात साल बात कुछ रक़म पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग के पास भेजी गई लेकिन राहिला के परिवार ने ये रक़म लेने से मना कर दिया.

Friday, March 1, 2019

भारतीय पायलट अभिनंदन की पत्नी से क्या पीएम मोदी ने की फ़ोन पर बात?

सोशल मीडिया पर दो ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनके साथ दावा किया जा रहा है कि वो भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की पत्नी के वीडियो हैं.

बीबीसी ने पाया कि इन दो वीडियो को फ़ेसबुक, ट्विटर और व्हॉट्स ऐप पर शेयर किया जा रहा है और इन्हें हज़ारों बार देखा जा चुका है.

वीडियो नंबर 1
इस वीडियो के साथ दावा किया गया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विंग कमांडर अभिनंदन की पत्नी से फ़ोन पर बात की और उनका दुख साझा किया.

'आजतक क्रिकेट' नाम के एक अनाधिकारिक यू-ट्यूब पेज ने इस वीडियो को शेयर किया है और दावा किया है कि अभिनंदन को वापस लाने के लिए पीएम मोदी ने विंग कमांडर की पत्नी से फ़ोन पर बात की.

अपनी पड़ताल में हमने इन दावों को ग़लत पाया क्योंकि ये वीडियो साल 2013 का है. उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उनकी वेबसाइट पर ये वीडियो 2 नवंबर 2013 को पोस्ट किया गया था.

इस वीडियो में नरेंद्र मोदी भारतीय जवान मुन्ना श्रीवास्तव की पत्नी से फ़ोन पर बात कर रहे थे. साल 2013 में मोदी की पटना रैली में हुए सीरियल बम धमाकों में मुन्ना श्रीवास्तव का देहांत हो गया था.

वीडियो में मोदी को कहते सुना जा सकता है, "मैं आपके घर आना चाहता था लेकिन ख़राब मौसम के कारण हेलिकॉप्टर नहीं उतर पाया. हमारे वर्कर आपसे मिलेंगे और हमारी पार्टी आपके परिवार का ख़्याल रखेगी."

यही वीडियो पुलवामा हमले के बाद भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था और लोगों ने दावा किया था कि आत्मघाती हमले में मारे गए सीआरपीएफ़ जवान की पत्नी से पीएम मोदी ने बात की.

ये वीडियो इस दावे के साथ शेयर किया जा रहा है कि विंग कमांडर अभिनंदन की पत्नी ने बीजेपी नेताओं से उनके पति को लेकर राजनीति न करने की अपील की है.

वीडियो में एक महिला को कहते सुना जा सकता है, "सभी सैनिकों के परिवारों की तरफ़ से मैं ये गुज़ारिश करना चाहती हूँ कि हमारे फ़ौजियों के बलिदान पर राजनीति न की जाए. ये संदेश ख़ासतौर पर राजनेताओं के लिए है. एक सैनिक बनने के लिए बहुत कुछ दाँव पर लगाना पड़ता है. इस बारे में सोचिए कि अभिनंदन के परिवार पर इस समय क्या गुज़र रही होगी."

भारतीय युवा कांग्रेस की ऑनलाइन मैग्ज़ीन युवा संदेश ने भी इस वीडियो को ट्वीट किया है जिसे कांग्रेसी नेता नवजोत सिंह सिद्धू और समाजवादी पार्टी के नेता राजेश री-ट्वीट कर चुके हैं.

ये वीडियो सैकड़ों बार देखा जा चुका है और काफ़ी लोगों ने इसे इसी दावे के साथ शेयर किया है.

लेकिन ये वीडियो विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की पत्नी का नहीं लगता क्योंकि इस वीडियो में जो महिला बात कर रही हैं वो ख़ुद को एक आर्मी अफ़सर की पत्नी बताती हैं, जबकि अभिनंदन भारतीय वायु सेना में वरिष्ठ अधिकारी हैं.

साथ ही वीडियो में ये महिला 'अभिनंदन के परिवार के बारे में विचार' करने को कहती हैं. वो ये नहीं कहतीं कि हमारे परिवार के बारे में सोचें.

वीडियो को रिवर्स सर्च करने पर हमें विंग कमांडर अभिनंदन की पत्नी की जो तस्वीरें मिलीं वो वीडियो में दिख रहीं महिला से क़त्तई मेल नहीं खातीं.

बहरहाल, अभिनंदन के परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हमने उनके परिवार की कोई भी तस्वीर न छापने का फ़ैसला किया है.