भारत बनाम न्यूज़ीलैंड. क्रिकेट की दुनिया में जब-जब इस मुक़ाबले की बात आती है, तो तड़के होने वाले टेस्ट मैच और सबेरे की चाय के समय शुरू होने वाले वनडे मैच याद आते हैं.
लेकिन अगर आप क्रिकेट को हटा दें, तो न्यूज़ीलैंड के बारे में आप क्या जानते हैं? शायद बहुत कम. है ना? अगर ऐसा है तो भी झिझकने की बात नहीं है.
क्योंकि आप तो सिर्फ़ न्यूज़ीलैंड के बारे में कम ही जानते हैं, इतिहास की नज़र से देखें तो बहुत पुरानी बात नहीं, जब ये दुनिया न्यूज़ीलैंड के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी.
दरअसल, न्यूज़ीलैंड दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक संप्रभु देश है. इसके भूगोल की बात करें तो ज़मीन के दो बड़े टुकड़े हैं, जिन्हें नॉर्थ आइलैंड और साउथ आइलैंड कहा जाता है. और बीच में क़रीब 600 छोटे द्वीप हैं.
न्यूज़ीलैंड ऑस्ट्रेलिया से क़रीब 1500 किलोमीटर के फ़ासले पर है और दोनों देशों के बीच तस्मानिया सागर है. न्यू कैलेडोनिया, फ़िजी और टोंगा जैसे दूसरे द्वीपों से ये क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर है.
ये देश इतना दूर है कि इंसानी बसावट भी यहां काफ़ी देर बाद पहुंची. न्यूज़ीलैंड की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक यहां का इतिहास शानदार है, जिसमें माओरी और यूरोपीय संस्कृति का मिश्रण मिलता है.
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न्यूज़ीलैड पहुंचने वाला सबसे पहला कबीला माओरी था. वो क़रीब एक हज़ार साल पहले हवाईकी से छोटी नौकाओं में सवार होकर यहां पहुंचे थे.
नीदरलैंड्स के रहने वाले एबल टैसमैन, इस देश को देखने वाले पहले यूरोपीय थे. हालांकि, वो ब्रिटेन था जिसने इस देश को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया. माओरी जब न्यूज़ीलैंड आए तो उसे औटेरो का नाम दिया, जिसका मतलब होता है 'लंबे सफ़ेद बादल वाली ज़मीन.'
माओरी के मुताबिक़ यहां पहुंचने वाले पहले शख़्स का नाम था क्यूप. वो सितारों और समंदर की लहरों को नेविगेशनल गाइड के तौर पर इस्तेमाल करते हुए अपने पोलीनेशियन घर हवाईकी से केनोइ पर सवार होकर यहां पहुंचे थे. ऐसा माना जाता है कि ये घटना क़रीब एक हज़ार साल पुरानी है.
एक दिलचस्प बात ये है कि अगर आप नक्शे पर हवाईकी खोजेंगे तो निराशा हाथ लगेगी लेकिन ऐसी मान्यता है कि माओरी साउथ पैसिफ़िक ओशियन के किसी द्वीप या द्वीप समूह से यहां आए थे.
क्यूप के बाद कई सैकड़ों साल तक दूसरे माओरी भी न्यूज़ीलैंड के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. ऐसा भी माना जाता है कि पोलीनेशिया से ये पलायन सुनियोजित था क्योंकि कई वाका हूरुआ यानी माओरी समाज के लोगों ने न्यूज़ीलैंड से हवाईकी का सफ़र भी किया.
माओरी समुदाय के लोग कुशल शिकारी और मछुआरे होते थे. उन्होंने ना केवल जानवरों, पंछियों और समंदर के जीवों का शिकार सीख लिया था बल्कि खेती करने में भी माहिर हो गए थे.
न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों के आने से पहले माओरी कबीलों के बीच युद्ध आम बात हुआ करती थी. माओरी योद्धा ताक़तवर और निडर हुआ करते थे और उन्होंने कई पारंपरिक हथियार तैयार करना सीख लिया था. आज भी इन्हें माओरी समारोहों में देखा जा सकता है.
माओरी के बाद अब बात न्यूज़ीलैंड के यूरोप से जुड़े तारों की. साल 1840 में वैतांगी संधि पर दस्तख़त हुए, जो ब्रिटिश क्राउन और माओरी के बीच हुए समझौते का आधार थी.
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इस संधि ने न्यूज़ीलैंड में ब्रिटिश क़ानून की नींव रखी और इसे न्यूज़ीलैंड का आधारभूत दस्तावेज़ माना जाता है और इस देश के इतिहास का अहम हिस्सा भी.
उस वक़्त न्यूज़ीलैंड में क़रीब सवा लाख माओरी और दो हज़ार बाहरी लोग रहते थे, जो यूरोप से वहां जाकर बसे थे. पहले सील और व्हेल का शिकार करने वाले यूरोपीय यहां पहुंचे, फिर मिशनरी और उसके बाद कारोबारी.
जैसे-जैसे न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों की तादाद बढ़ने लगी, माओरी के बीच ये डर भी बढ़ने लगा कि ज़मीन को लेकर उनके साथ होने वाली सौदेबाज़ी में गड़बड़ की जा रही है. ये ख़ौफ़ भी बढ़ गया कि अगर इसे वक़्त रहते नहीं रोका गया तो फ़्रांस जैसा देश न्यूज़ीलैंड पर कब्ज़ा कर सकता है.
साथ ही वो ब्रिटिश लोगों की गैरकानूनी हरकतों को भी रोकना चाहते थे.
ब्रिटिश सेटलमेंट बढ़ने के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार ने माओरी कबीलों के प्रमुखों के साथ मिलकर औपचारिक दस्तावेज़ तैयार किया जिसके तहत न्यूज़ीलैंड को ब्रिटिश कॉलोनी बनाया गया.
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