Thursday, March 14, 2019

समझौता ट्रेन धमाके का फ़ैसला ऐन वक़्त पर टलवाने वाली राहिला कौन

हिंदुत्ववादी विचारधारा रखने वाले असीमानंद सहित सुनील जोशी, रामचंद्र कालसांगरा, संदीप डांगे और लोकेश शर्मा का नाम आरोप पत्र में शामिल है.

तभी ख़बर आई कि फ़ैसले को 14 मार्च के लिए टाल दिया गया है.

कारण था कि एक पाकिस्तानी महिला राहिला वकील ने एक भारतीय वकील मोमिन मलिक के माध्यम से अदालत में दिए आवेदन में कहा कि मामले से जुड़े पाकिस्तानी चश्मदीदों को बुलाया जाए और वो भी अपनी बात अदालत के सामने रखना चाहते हैं.

जांच एजेंसी एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी से कहा कि इससे पहले अदालत के कई समन जारी करने के बावजूद पाकिस्तान की तरफ़ से से कोई जवाब नहीं आया था.

उधर राहिला का दावा है कि उन्हें आज तक कोई समन नहीं मिला.

फ़ैसले के ऐन वक्त पर आवेदन दाख़िल करने वाली राहिला वकील आखिर कौन हैं?

समझौता ब्लास्ट से संबंध
18 फ़रवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत में हुए एक धमाके और उसके बाद लगी आग में 68 लोग मारे गए थे. मरने वालों में ज़्यादातर पाकिस्तानी थे.

मैं धमाके के कुछ घंटे बाद ही घटनास्थल पर पहुंचा था.

धमाके और आग से रेल के डिब्बे अंदर और बाहर से पूरी तरह जल गए थे.

कुछ दूर पर ही एक कमरे में मृतकों के कुछ शवों को इकट्ठा करके रखा गया था.

भारत सरकार के मुताबिक़ मरने वालों में मोहम्मद वकील भी शामिल थे. राहिला मोहम्मद वकील के बेटी हैं.

पाकिस्तान के हफ़ीज़ाबाद ज़िले के ढींगरावाली गांव की रहने वाली राहिला मानने को तैयार नहीं हैं कि ट्रेन हादसे में उनके पिता मोहम्मद वकील की मौत हो गई थी.

राहिला का मानना है कि उनके पिता किसी भारतीय जेल में बंद हैं.

लंबे वक्त से भारत में राहिला के वकील पानीपत के मोमिन मलिक के मुताबिक उन्होंने करीब 90 भारतीय जेलों में आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी लेकिन कहीं भी मोहम्मद वकील नहीं मिले.

आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी राहिला 18 जनवरी को अपने घर पर ही थीं जब उन्हें टीवी पर ट्रेन बम धमाके का पता चला.

मोहम्मद वकील 11 जनवरी को एक महीने के लिए भारत के मुजफ्फ़रनगर में अपने परिवार से मिलने पहुंचे थे लेकिन पाकिस्तान में बेटे के एक्सीडेंट के बाद वो जल्दी ही वापस पाकिस्तान की ओर रवाना हो गए.

लेकिन वो आज तक घर नहीं पहुंचे.

राहिला की मां का परिवार उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर का रहने वाला है.

राहिला के वकील मोमिन मलिक ने अमृतसर में हमारे सहयोगी रविंदर सिंह रॉबिन को बताया कि अधिकारियों को कई चिट्ठियां लिखने के बाद ही साल 2010 में एनआईए ने उनसे मोहम्मद वकील की मौत की पुष्टि की.

बीबीसी से बातचीत में राहिला ने अपने दावे के चार मुख्य आधारों को गिनाया.

धमाके के एक दिन पहले की रात को याद करते हुए राहिला बताती हैं, "मामू ने अब्बू से बात करवाई थी... अब्बू ने कहा था कि हम ट्रेन में बैठ गए हैं. ट्रेन चलने वाली है. आपके मामू दिल्ली में ट्रेन में बैठाने आए हुए हैं. आप लोग परेशान न हों."

धमाके के थोड़े वक्त बाद ही राहिला अपने अंकल के साथ 10 दिनों के इमरजेंसी वीज़ा पर पानीपत पहुंचीं.

वो बताती हैं, "रेलवे वालों ने सामान चेक करवाया. मैंने एक-एक शव को देखा और चेक किया", लेकिन उन्हें अपने पिता से जुड़ा कोई सामान नहीं मिला.

राहिला के मुताबिक पानीपत में उनका डीएनए टेस्ट हुआ जिसके नतीजे किसी भी शव के डीएनए से मैच नहीं हुए.

उनका दावा है कि 2008-9 में उनके पास भारत सरकार की ओर एक चिट्ठी आई जिसमें कहा गया कि उनका बेटा या भाई दोबारा डीएनए टेस्ट के लिए भारत आए.

वो कहती हैं, "मेरे छोटे भाई और चाचा भारत गए. उनका भी डीएनए टेस्ट किसी शव से मैच नहीं हुआ."

एनआईए वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया राहिला ने तो "रेलवे ट्राइब्यूनल से क्लेम भी ले लिया है... नो नो नो. उनका कहना है कि चश्मदीद एक दो ज़िंदा हैं... उन्होंने कोई नाम भी नहीं दिए हैं."

उधर राहिला का परिवार कोई मुआवज़ा मिलने से इनकार करती हैं.

उनके वकील मोमिन मलिक ने अमृतसर में हमारे साथी रविंदर सिंह रॉबिन को बताया कि साल 2010 में उन्होंने मुआवज़े की रक़म के लिए अदालत में एक अर्ज़ी दाखिल की थी.

सात साल बात कुछ रक़म पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग के पास भेजी गई लेकिन राहिला के परिवार ने ये रक़म लेने से मना कर दिया.

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